إعادة صياغة لغوية للنص:
**الفصل 491: ملك القراصنة: المدينة الذهبية (8)**
"إذا كنتِ تستطيعين فعل ذلك فلتُقدمي وتُجرّبي ؟ "
جلس أوريزين أمام طاولة القمار ، مُرتدياً ابتسامة باهتة ، ومدّ يداً واحدة برفق ، وكان اتجاه تلك اليد الممدودة مُستهدفاً بدقة نحو الباكارات الجذابة والنارية.
"ماذا يعني … القدرة ؟ هل تقصدين مستخدم فاكهة الشيطان ؟!! "
شعر أوسوب بحيرة طفيفة ولم يفهم تماماً ما يعنيه هذا.
أطلقت الدمية ذات الرأس الكبير بجانبه ابتسامة ماكرة ، وباعتبار أنهما شكّلا تحالفاً مؤقتاً ، أجابت على سؤاله:
"سـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـسـ...ـس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